मेरठ ।।।नीला ड्रम मर्डर केस में साहिल और मुस्कान को महाभारत के श्लोक के साथ सजा-ए- मौत ।
बहुचर्चित नीले ड्रम वाले सौरभ राजपूत हत्याकांड में मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को फांसी की सजा सुनाई गई है. अदालत ने अपने अहम फैसले में न्याय व्यवस्था की भूमिका और अपराध के सामाजिक प्रभाव का विशेष तौर पर जिक्र किया गया है. फैसले में सुप्रीम कोर्ट के एक निर्णय का हवाला दिया गया है, जिसमें कहा गया है कि अपराध समाज में डर का माहौल पैदा करता है और इसका सामाजिक चेतना पर बुरा असर पड़ता है. मेरठ के जिला जज अरविंद कुमार मिश्र ने अपने आदेश में कानून, समाज और न्याय व्यवस्था के बीच संबंध को समझाने के लिए महाभारत के एक श्लोक का भी उल्लेख किया है। आई इन दोनों बातों को विस्तार से जानते हैं।।।।।।।
सबसे पहले समझ लेते हैं फैसले में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के हवाले के बारे में. यह मामला ‘एडक्कंडी दिनेशन उर्फ पी. दिनेशन बनाम केरल राज्य, 2025 आईएनएससी. 28’ है, जिसका हवाला दिया गया है. इस मामले में शीर्ष अदालत ने क्रिमिनल केसों में अदालत के दायित्व को साफ करते हुए समाज में अपराध के प्रभाव और न्याय व्यवस्था की जिम्मेदारी पर टिप्पणी की है।
अपराध से सामाजिक चेतना के लिए घातक।
जिला जज अरविंद कुमार मिश्र के आदेश में लिखी गई सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के मुताबिक, अपराध समाज में भय का माहौल बनाता है. इससे सामाजिक चेतना प्रभावित होती है. अगर समाज में ऐसी स्थिति बनी रहती है तो उसे अनुचित और अन्यायपूर्ण माना जाता है. सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी में कहा गया है कि एक सभ्य समाज में आपराधिक न्याय व्यवस्था का मकसद व्यक्ति की गरिमा की रक्षा करना, समाज में स्थिरता और व्यवस्था बहाल करना तथा लोगों के बीच विश्वास और एकजुटता पैदा करना है. फैसले में दर्ज इस टिप्पणी केअनुसार न्यायालयों के सामने आरोपी के हितों और राज्य या समाज के हितों के बीच संतुलन बनाने की जिम्मेदारी होती है. इस तरह न्यायिक प्रक्रिया में एक तरफ आरोपी के अधिकारों और दूसरी तरफ समाज के हितों को ध्यान में रखने की बात कही गई है।
महाभारत के श्लोक के जरिए कानून और समाज का रिश्ता समझाया।।।।।।।।।।।
फैसले में महाभारत के एक श्लोक का भी उल्लेख किया गया है, जिसके जरिए कानून और समाज के परस्पर संबंध को समझाने का प्रयास किया गया है. श्लोक इस प्रकार है।

निर्वनो वध्यते व्याघ्रो निर्वयाघ्रं छिद्यते वनम्।
तस्माद्व्याघ्रो वनं रक्षेद्वनं व्यघ्रं च पालययेत्।।
-महाभारत”””””’!
समझाया गया है. इसमें वन की तुलना समाज से और व्याघ्र की तुलना दंड या कानून से की गई है. इसके अनुसार, समाज के बिना कानून का अस्तित्व प्रभावित होता है और दंड या कानून से रहित समाज भी सुरक्षित नहीं रह सकता. फैसले में इसका आशय बताया गया है कि कानून को समाज की रक्षा करनी चाहिए और समाज को भी अपने भीतर कानून को बनाए रखना चाहिए. इस उदाहरण के जरिए कानून और समाज की एक-दूसरे पर निर्भरता को रेखांकित किया गया है।।।।
कुल मिलाकर अदालतों के इस तरीके के फैसले जघन्य अपराधों के प्रति लोगों मैं कानून के प्रति डर और समझ को पैदा करते हैं और विश्वास को बढ़ाते हैं।।।।।
- वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से पेशी: जब अदालत की कार्रवाई शुरू हुई, तो दोनों को जेल से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश किया गया। [1, 2]
- मौन और प्रतिक्रिया: जब जज ने मुस्कान और साहिल से पूछा कि क्या वे कुछ कहना चाहते हैं या कोई दलील देना चाहते हैं, तो दोनों ने शुरुआत में कुछ नहीं कहा और मौन रहे। [1, 2]
- सजा सुनने के बाद: जब अदालत ने फांसी की सजा सुनाई, तो दोनों फूट-फूटकर रोने लगे। मुस्कान ने हाथ जोड़कर अपनी बेटियों (बच्चों) का ख्याल रखने की गुहार लगाई। इससे पहले कनविक्शन के दौरान मुस्कान ने कहा था, “जो करना था, वह हमने कर दिया”। [1, 2, 3]
