बुधवार जारी अधिसूचना ने इस पूरी व्यवस्था को पलट दिया है. नई व्यवस्था के तहत अब किसी भी निर्माण को मंजूरी देने से पहले सबसे पहले यह जांचा जाएगा कि मास्टर प्लान और जोनल प्लान में उस जमीन का लैंडयूज दरअसल क्या है ? अगर जमीन कागजों में आवासीय दर्ज है. तो महज सड़क की चौड़ाई के भरोसे वहां कॉमर्शियल निर्माण की उम्मीद अब बेमानी होगी।
अब तक अगर किसी आवासीय कॉलोनी के प्लॉट के सामने 40 फीट या उससे चौड़ी सड़क निकल रही हो तो उसे कॉमर्शियल नक्शा पास कराने का एक तरह से शॉर्टकट मान लिया जाता था.अब यह पुरानी परिपाटी खत्म हो गई है ,सड़क कितनी भी चौड़ी क्यों न हो अकेले इस आधार पर कोई मंजूरी नहीं मिलेगी।
नई अधिसूचना के मुताबिक होटल,अस्पताल,कॉमर्शियल कॉम्प्लेक्स समेत तमाम व्यावसायिक गतिविधियों के लिए जमीन का कॉमर्शियल लैंडयूज में होना जरूरी कर दिया गया है. इसका सबसे सीधा असर उन इलाकों में दिखेगा जहां आवासीय कॉलोनियों के बीचोबीच व्यावसायिक गतिविधियां हो रही थी।
यूनिफाइड जोनिंग रेगुलेशन के तहत मास्टर प्लान के अनुसार कुल 152 गतिविधियों को अधिसूचित किया गया है, इस लंबी सूची में आवासीय योजनाएं, कृषि, पार्क, पशुपालन, आंगनबाड़ी, आश्रम, सभागार, बैंक्वेट हॉल, बर्ड सेंचुरी, बॉटनिकल गार्डन, बोर्डिंग हाउस, ईंट भट्ठा, कब्रिस्तान, बस स्टैंड और कॉलेज जैसी तमाम गतिविधियां शामिल हैं।
मंजूरी प्रक्रिया भी सख्त
नए नियमों ने निर्माण की मंजूरियों की पूरी प्रक्रिया को भी कसा है. जिन मामलों में विशेष अनुमति की दरकार होगी, वहां फैसला अब शासन स्तर पर ही लिया जाएगा. विकास प्राधिकरणों के स्तर पर दी जाने वाली मंजूरियों का दायरा सीमित कर दिया गया है और शासन स्तर पर भी नगर नियोजन विभाग की संस्तुति के बाद ही अंतिम फैसला होगा।
इस नियम परिवर्तन का सबसे ज्यादा असर उन शहरों और इलाकों पर पड़ेगी जहां मुख्य सड़कों के किनारे आवासीय इलाकों का तेजी से व्यावसायीकरण होता रहा। अब सड़क की चौड़ाई की जगह निर्धारित लैंडयूज को तरजीह मिलेगी, तो आवासीय कॉलोनियों में होटल, अस्पताल, कॉमर्शियल कॉम्प्लेक्स और अन्य व्यावसायिक निर्माणों के लिए नियम पहले से काफी सख्त हो जाएंगे।